री निर्मलसागरजी महाराज सा. की मंगल – आरती

।। श्री नेमीनायाय नम : ।।

गिरनार – गौरव – तीर्थरक्षा शिरोमणी
प.पू. दिगम्बराचार्य  श्री निर्मलसागरजी महाराज सा. की मंगल – आरती

(रचयिता – ‘ संगीतरत्न ‘ प्रो. सुशील पाटनी ‘शील’ अजमेर)
( तर्ज :- मन डोले, मेरा तन डोले…. नागिन )

‘ निर्मलसागर ‘ की गुण आगर की, शुभ मंगल दीप सजाय के,
हम आज उतारे आतरियां ।। टेर ।।
पिता ‘ बहोरेलाल ‘ श्रीमती मां ‘ गोमा ‘ के जाये ।
पहाड़ीपुर ऐटा जन्में शुभ, नाम ‘ रमेश ‘ घराये ।
बड़भागी की, वैरागी की, उर आनन्द साज बजाय के
हम आज उतारे आरतियां ।। 1 ।।

जो आलोकिक नर होते हैं, करते काम अनोखे ।
लक्षण उनके पलने में ही, दिखते चौखे चौखे ।
‘ रवि- इन्दु ‘ सम, हर मिय्यातम, रत्नत्रय ज्योति जगाय के
हम आज उतारे आरतियां ।। 2 ।।

करुणासागर, वत्सलआगर, जग जन के उपकारी ।
त्याग तपस्या गंध से महके, तव जीवन फुलवारी ।
गृह त्यागी की, शिव रागी की, कर दीप सुमन का वाल ले,
हम आज उतारे आरतियां ।। 3 ।।

ययानाम तव गुण घारी, निर्मलसागर निर्विकारी ।
गिरिनार संरक्षण हित, नित अलख जगाते भारी ।
भविकों आओ, ध्वज फहराओं, जय जैन घरम उच्चार के
हम आज उतारे आरतियां ।। 4 ।।

आज जगा सौभाग्य हमारा, नर-नारी हर्षाये ।
धन्य भविक जन, निज कहो से ‘ शील ‘ आरती गाये ।
नाचे गायें, नम गुंजावें, शुभ स्वरों की जय-जयकार से
हम आज उतारे आरतियां ।। 5 ।।

शत-शत-नमन-वन्दन
श्री दिगम्बर जैन संगीत मंडल, अजमेर (राज.)
(स्थापित सन् – 1870 ई:)

आरती रचना-नवम्बर – 2014

डाउनलोड श्री निर्मलसागरजी महाराज सा. की मंगल – आरती