गिरनार का संक्षिप्त परिचय

गुजरात के सौराष्ट्र संभाग में जूनागढ़ के पूर्व में लगभग 7 कि.मी. के फासले पर सुप्रसिद्ध जैन तीर्थक्षेत्र गिरनार पर्वत है । यह पर्वत 3666 फीट ऊँचा है । जिस समय आकाश स्वच्छ होता है, उस समय शत्रुंजय पर्वत या सिद्धाचल से भी इसके दर्शन होते हैं इसके दाहिनी औऱ जो पर्वत है उसकी ऊँचाई 2779 फीट है, इसे मदारपीर का पर्वत कहा जाता है । मुसलमान भाइयों का यह पर्वत बहुत ही पवित्र है । गिरनार पर्वत पर पाँच टोंक हैं पहली टोंक से सहस्त्राम्रवन (सैसावन) को मार्ग है । सहस्त्राम्रवन में भगवान नेमिनाथ ने दीक्षा ली थी और यहीं पर मनुष्य और देवों ने दीक्षा कल्याणक मनाया था । वहाँ पर भगवान नेमिनाथ के चरण चिन्ह है । गिरनार पर्वत की पाँचों टोंको और सहस्त्राम्रवन के लिये पक्की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं । कुल सीढ़ियाँ की संख्या 9999 है । पहली टोंक तक जाने के लिये 4400 सीढ़ियाँ हैं, पहली टोंक से दूसरी टोंक के लिये 900 सीढ़ियाँ हैं, दूसरी टोंक से तीसरी से पाँचवी टोंक तक के लिये 2500 सीढ़ियाँ हैं । चौथी टोंक के लिये सीढ़ियाँ की व्यवस्था नहीं है अनगढ़ पत्थरों से जाना पड़ता है । सहस्त्राम्रवन पर पहली टोंक से जाने की सीढ़ियाँ हैं और पुन: उन्ही सीढ़ियाँ से वापसि आना पड़ता है, क्योंकि सहस्त्राम्रवन से धर्मशाला तक जाने से वापिसी आने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।

गिरनार की महत्ता विदेशी यात्री की दृष्टि में –

ईस्वी सातवीं – शताब्दी में चीनी यात्री हुएनसांग जह भारत आया तो वह सौराष्ट्र भी गया । वहाँ गिरनार की महानता देखकर वह उसकी ओर आकृष्ट हुआ । उसने लिखा हैं, “नगर से थोड़ी दूर तक पहाड़” चूह चेन- हो ” (उज्जन्त) नामक है, जिस पर पीछे की ओर एक संधाराम (बौद्ध बिहार) बना हुआ है । इसकी कोठरियाँ आदि अधिकतर पहाड़ खोदकर बनाई हैं । यह पहाड़ घने जंगली वृक्षों से आच्छादित हैं । वहाँ पर महात्मा और विद्वान पुरुष विचरण किया करते हैं । तथा आध्यात्मिक – शक्ति सम्पन्न बड़े – बड़े ऋषि आकर एकत्रित हुआ करते हैं, औऱ विश्राम किया करते हैं ।” इस वर्णन से स्पष्ट है कि गिरिनार उस समय भी भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक केन्द्र बना हुआ था । और आज भी उसकी यह विशेषता विद्यमान हैं ।

सुप्रसिद्ध इतिहास विद्वान मि. बर्गेस, मि. टाड आदि को गिरनार पर्वत पर कुछ शिलालेख वि.सं. 1123,1212,1222 के मिले हैं, जिनमें श्रावकों द्वारा सीढ़ियाँ बनाने का उल्लेख है । सं. 1215 के एक शिलालेख में राज सावदेव और जसहड़ द्वारा ठा. सालवाहण ने देवकुलिकायें बनवाई, इसका उल्लेख है । सं. 1215 के शिलालेख के अनुसार प्रचीन मन्दिरों के स्थान पर नवीन मन्दिरों का निर्माण कराया गया, ऐसा उल्लेख हैं ।

वन्दना यात्रा प्रारम्भ –

जूनागढ़ नगर की बड़ी और सरकारी सड़को को पार करने पर दक्षिण द्वार से नगर प्राचीर के बाहर निकलते ही सामने गिरनार को पहाड़ियाँ दूर-दूर तक फैली हुई दिखाई पड़ती हैं । उनके बीचों बीच में ‘दुर्गा की पैड़ी’ के सम्मुख एक विशाल उपत्यका मन को मोहती है ओर उसके मध्य में ऊँचा सा ऊर्जयन्त निराली शान से ख़ड़ा हुआ बड़े – बड़े सम्राटों को चुनौती देता है । क्य़ोंकि यादवेन्द्र नेमि की तपस्या और ध्यान आराधना से वह पवित्र जो हुआ है ।

जूनागढ़ के प्राचीर तोरण से निकले ही सड़क के दोनों और गहन वन हैं, जिसके बीच में जहाँ – तहाँ छोटे-छोटे मन्दिर और वापियाँ हैं । इनमें रेवती कुंड प्रसिद्ध हैं – जैनेतर लोग उसमें स्नान करते हैँ । इससे आगे गिरनार पर्वत हैं । मन्दिरों के अतिरिक्त गिरनार पर तीन प्रसिद्ध कुण्ड- गोमुखी, हनुमान धारा और कमंडल कुंड हैं । ‘भैरवजय’ नामक पाषण भी दर्शनीय है ।

गिरनार की तलहटी में सम्राट अशोक के प्रसिद्ध धर्मलेख हैं । मार्ग में पोलिटिकल – एजेन्ट श्री सुन्दर जी का बनवाया हुआ पलासिनी नदी का सुन्दर पुल है । तलहटी के छोर पर कई धर्मशालायें बनी हुई हैं जो सड़क के दोनों ओर आमने सामने हैं । यहाँ हिन्दुओं के मन्दिर और धर्मशालायें भी हैं । दिगम्बर धर्मशाला के अन्दर तीन मन्दिर बने हैं । एक मानस्तम्भ हैं प्रतापगढ़ के धर्मात्मा नर – रत्न श्री बंडीलाल जी जैन के वंशजों ने गिरनार तीर्थ को दशा की सम्मुन्नत बनाया था ।वर्तमान में विश्व शांति निर्मल ध्यान केन्द्र ट्रस्ट द्वारा इस तीर्थ का प्रवन्ध हो रहा है ।

दिगम्बर धर्मशाला से लगभग सौ कदम के फासले पर पर्वत पर चढ़ने का द्वार हैं । यहाँ अंग्रेजी और गुजराती के दो शिलालेखी हैं । उनके ज्ञात होता हैं कि जूनागढ़ के भूतपूर्व दीवान श्री बेचरदास बिहारीलाल, उनके भाई और डाक्टर त्रिभुवनदास मोतीचन्द शाह (जैन) के प्रयत्न से ‘जूनागढ़ लाटरी’ खोली गई । उससे एकत्रित धन से 1 लाख की लागत से काले पत्थरों की मजबूत सीढ़ियाँ लगवाई गई । जो द्वार से प्रारम्भ होती हैं । सीढ़ीयों से चढ़ते हुये जाने के मार्ग में कई बड़ी बड़ी गुफायें हैं जिनमें अजैन साधु रहते हैं ।

प्रथम टोंक –

लगभग 4400 सीढ़ियाँ चढ़ने पर प्रथम टोंक आती है । यहाँ ‘रा-खंगार’ का ध्वस्त कोट और महल है । एक समय मध्यकाल में गिरनार पर्वत पर चूड़ा समास वंश के राजाओं का अधिकार था । वहाँ पर उनका सुद्दढ़गढ़ बना हुआ था । रा- खंगार नरेश ने जैनों की रक्षा की थी, वह चूड़ा समासवंश का राजा था । यह राजवंश यदुकुल से सम्बन्धित था । इनके पूर्वज चन्द्रचूड़ दसवीं शताब्दी में सिन्धु देश से आकर जूनागढ़ पर अधिकारी हुये थे । वे जैन धर्म के सूत्र थे । उन राजाओं में श्री मण्डलीक नामक राजा प्रमुख थे जिन्होंने पर्वत पर भगवान नेमिनाम का मंदिर बनवाया था और शिलापट्ट पर अपनी प्रशस्ति अकिंत कराई थी । प्रशस्ति में गिरनार की महिमा का वर्णन किया है – “हे अमर पर्वत ! गर्व मत करो, सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र तुम्हारे प्रेम में ऐसे मुग्ध हुए हैं कि रास्ता चलना भूल गए हैं , (वह तुम्हारी ही प्रदक्षिणा देते हैं), भला लोक में ऐसा कौन है जो तुम पर मुग्ध न हो ! जय हो, एक मात्र रैवत की, जिसके दर्शन करने से लोक भ्रान्ति को खोकर आनन्द का भोग करते हैं और परम सुख को पाते हैं । “

रा- खंगार के खंडहरों को पार कर आगे पर्वत शिखर पर चलते हैं । गिरनार की इस पहली टोंक पर जैनों के नयनाभिराम मन्दिर बने हैं, जो भारतीय कला के अदभुत नमूनें हैं । इन पर श्वेताम्बरों का अधिकार है । यहाँ पर श्वेताम्बर और दिगम्बरोंकी एक -एक धर्मशाला हैं । आगे चलने पर एक पर्वत शिला में पदमावती देवी और उसके शीर्ष पर जैन तीर्थकर श्री पार्श्वनाथ की मूर्ति हैं । फिर राजुल की गुफा हैं, उसमें बैठकर जाना पड़ता हैं । उसके अन्दर खड़े नहीं हो सकते ।

आगे बढ़ने पर एक परकोटे के अन्दर तीन दिगम्बर जैन मन्दिर है और एक छतरी है । इन मन्दिरों में से एक को प्रतापगढ़ निवासी श्री बंडीलालजी निर्माण कराया था औऱ दूसरे को शोलापुर के जैन श्रेष्ठियों ने बनवाया था । मालूम होता है कि प्राचीन मन्दिरों के स्थान पर ये मन्दिर बनाये गये हैं । दिगम्बर जैनों के कुछ और प्राचीन मन्दिर थे, जो श्वेताम्बर मन्दिरों के परकोटे में हैं । इनमें एक प्राचीन मन्दिर ग्रेनाइट पाषाण का है जिसकी मरम्मत सं. 1312 में सेठ मानसिंह भोजराज ने की थी । कर्नल टाड ने इस मन्दिर को दिगम्बर जैनों का लिखा है ।

Burgess, the Report on the Antiquities of Kathi and Kaccha

“To the east of the Devakota, there are several temples, the principal being the temple of Man Singh Bhoj Raj of Kaccha – an old granite temple near the entrance gate which Tod called a Digaamber temple of Neminath.”

लगभग 140 वर्ष पहले दोनों सम्प्रदायों ने इस मंदिर की संयुक्त व्यवस्था कर रखी थी । एक समय इसकी व्यवस्था में श्वेताम्बर समाज का बहुमत था । उन्होंने इसका लाभ उठाकर इस मंदिर पर अधिकार कर लिया ।

इस मन्दिर से आगे थोड़ा चलने पर गोमुखी से जलधारा निकलती हैं । जिसके जल से कई कुण्ड बन गये हैं । गोमुख के पुष्ठ भाग पर दीवार में एक वेदी पर 24 तीर्थकरों के चौबीस चरण चिन्ह बने हैं ।

द्वितीय टोंक –

आगे 900 सीढ़ियाँ चढ़ने पर द्वितीय टोंक मिलती हैं । बायीं ओर एक चबूतरे पर एक छतरी के नीचे जैन मुनिश्री अनिरुद्ध कुमार के प्राचीन चरण हैं । जैन मुनि श्री अनिरुद्ध कुमार ने यहीं तप करके निर्वाण प्राप्त किया था । श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ओऱ प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध कुमार थे । इसके निकट ही अम्बा देवी का ऊँची चौकी पर विशाल मन्दिर है । वर्जेंस (Burgess) का अनुमान है कि यह मन्दिर मूल में दिगम्बर जैनों का है । किन्तु आजकल हिन्दुओं के अधिकार में है । इसकी मान्यता दिगम्बर, श्वेताम्बर जैनों और हिन्दुओं में है ।

तीसरी टोंक –

आगे 700 सीढ़ियाँ पर रास्ते के बायीं ओर जैन मुनिश्री शम्बुकुमार के चरण चिन्ह बने हैं । यहाँ से जैन मुनि श्री शम्बुकुमार को निर्वाण प्राप्त हुआ था । शम्बुकुमार श्री कृष्ण की पत्नी जाम्बवती के पुत्र हैं ।

चौथी टोंक –

तीसरी टोंक से सीढ़ियाँ नीचे की ओऱ जीती हैं । लगभग 1500 सीढ़ियाँ उतरने और चढ़ने पर चौथी टोंक का पर्वत मिलता है । खड़ा पहाड़ है । चढ़ने के लिये सीढ़ियों की व्यवस्था नहीं है । मार्गदर्शन के लिये लाल रंग से चट्टानों पर तीर के संकेत बना रखे हैं । चढ़ाई कठिन है । किन्तु भक्त साहस और परिश्रम से थोड़ा कष्ट सहकर चढ़ सकते है । पहाड़ की चोटी पर एक शिला पर चरण बने हैं । ये चरण चिन्ह जैन मुनि श्री प्रद्युम्न कुमार के हैं । यह श्री कृष्ण – रुक्मणी के पुत्र थे । यहाँ से जैन मुनि श्री प्रद्युम्न कुमार ने कर्मो का नाश कर मोक्ष प्राप्त किया था । चरणों के निकट ही एक शिला में लगभग एक ऊँची श्री नेमिनाथ की मूर्ति तथा दूसरी शिला पर चरण हैं ।

पाँचवी टोंक –

चौथी टोंक से उतरकर फिर सीढ़ियाँ कुछ दूरी पर ऊपर की ओर पाँचवीं टोंक के लिये जाती है । यह शिखर सबसे ऊँचा है और इसको चारों ओऱ का दृश्य अत्यन्त मनोहारी है ।

कुछ सीढ़ियाँ चढ़ने पर प्रथम दृष्टि में ही एक अलौकिक आत्मल्हाद की सिहरन हृदय को गुदगुदाने लगती है । दूर क्षितिज में ऊषा की लालिमा का घूँघट उठाते हुये रवि झाँकते दिखाई पड़ते हैं – यह नैसर्गिक दृश्य आत्म विभोर कर देता है । देखते – देखते अपने आपकी सुघ-बुध भूल जाते हैं । परन्तु यह तो संसारी जीव है, अलौकिक आनन्द में कितने समय टिक सकता है ? काश ! अन्तर में वह ज्ञान लालिमा जाग उठे । विचारों मे मग्न एक देवकुलिका (छतरी) में भगवान श्री नेमिनाथ के चरण – चिन्हों के दर्शन होते हैं । यहाँ पर एक भारी घंटा बंधा हुआ है । इसकी देखभाल एक साधु करता है । जबकि चरणों के पास ही एक पदमासन दिगम्बर जैन प्रतिमा बनी है । मुनि वरदत्त भी यहाँ से मुक्त हुये थे ।

लोटते हुये मार्ग में एक शिला में 1-1 फीट ऊँची-ऊँची दो मूर्तियों उत्कीर्ण हैं । दार्यीं ओर गोमेद यक्ष और अम्बिका की मूर्ति है । उनके शीर्ष पर भगवान नेमिनाथ की मूर्ति बनी हुई हैं ।

पाँचवी टोंक से पुन: उसी मार्ग से वापिस लौटते हैं, जिस मार्ग से गये थे । लौटते हुए दूसरी टोंक से चौराहे से उत्तर की ओर गोंमुखी कुण्ड से सहसावन (सहस्त्राम्रवन) को मार्ग जाता है । सहस्त्राम्रवन में भगवान नेमिनाथ के दीक्षा कल्याणक और केवल ज्ञान कल्याणक की द्योतक देव कुलिकाओं में चरण बने हुए हैं । यहाँ सहस्त्राम्रवन की हरियाली औऱ ठण्डक शारीरिक और मानसिक थकान को दूर कर नवीन उत्साह को जागृत करती है । दीक्षावन में पहुँचते ही उसमें रमण करने को जी चाहता है ओर चाह होती है कि मोह पाश को तोड़कर श्री नेमिनाथ के चरणों में ध्यान रम जावे । वहाँ से लौटकर धर्मशाला में आते हैं और वहाँ के मन्दिरों के दर्शन करते हैं ।

यह है गिरनार का वर्तमान रुप (सन् – 1999) । लेकिन इतिहास के अलोक में जब गिरनार को देखने का प्रयास करते हैं तो उसे नेमि और कृष्ण के काल में ऊर्जयन्त अथवा रैवत नाम से प्रख्यात पाते हैं और भगवान नेमि के तप, ज्ञान ओऱ निर्वाण से पवित्र हो चुका है । किन्तु उस समय की कोई कृति शेष नहीं है, केवल गिरिराज अपने अंग में पावन स्मृतियों को लिये हुए इठलाते से खड़े हैं । किन्तु मौर्यकाल के अवशेष अवश्य मिलते हैं ।

और अवशेष हैं कुछ शिलालेख जिनका वर्णन कृति में विषयानुसार करेंगे । यहाँ गढ़ गिरनार पर 36 लेख हैं जो सब प्राय : वस्तुपाल – तेजपाल मंत्रियों के हैं । नेमिनाथ मन्दिर के द्वार पर दक्षिण अहाते के पश्चिम में स्थित एक छोटे मन्दिर की भीति पर एक दिगम्बर जैन लेख के पश्चिम शब्द है –

“सं. 1522 श्री मूलसंघे श्री हर्षकीर्ति, श्री पदमकीर्ति भुवनकीर्ति ————–

गिरनार की पहाड़ी पर एक शिलाखंड पर अशोक के 14 लेख तथा महाक्षत्रप, रुद्रदामा प्रथम और गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त का एक-एक लेख उत्कीर्ण हैं । इन शिलालेखों का क्षेत्रफल 100 वर्ग फुट लगभग है ।

गिरनार की महिमा

जैन धर्म के 22वें तीर्थकर भगवान नेमिनाम सौराष्ट्र में स्थित पर्वत से मुक्त हुये थे । यह गिरनार पर्वत विन्ध्याचल पर्वत का ही एक भाग हैं । विन्ध्याचल पर्वत बिहार से प्रारम्भ होकर हुजरात तक 700 साल मील लम्बा है तथा जूनागढ़ से हैदराबाद होता हुआ कर्णाट देश तक चला गया हैं ।

गिरनार पर्वत के कई नाम है, जैसे – गिरनार, रैवतक, उर्ज्जयन्त, वस्त्राचल प्रभास, रामगिरि आदि । इस नामकरण का भी इतिहास है । गिरनार- ‘ यस्मिन गिरौं नकारणेन नष्टा जरा : घाति कर्माणि स: गिरनार: अर्थात् जिस पर्वत पर मुनियों के चार घातिया कर्म नष्ट हुए, उसको गिरनार कहते हैं ।

रैवतक – रेवा नगर के निकट अथवा रेवानगर के राज्य में होने से रैवत या रैवतक कहा गया । ऐतिहासिक प्रमाण गिरनार और उसके महात्म्य की प्राचीनता का पोषक वह सर्व प्राचीन ताम्रपत्र है, जिसे प्रोफेसर प्राणनाथ ने निम्नलिखित शब्दार्थ में प्रस्तुत किया है –

ऊर्जयन्त (उज्जयन्त) – भगवान नेमिनाथ ने अष्ट कर्मों का नाश कर ऊर्ध्वगमन अर्थात् ऊपर लोकशिखर पर स्थित सिद्धालय में गमन किया और अष्टकर्मो पर जय पाई, अतएव उस स्थान को ऊर्जयन्त कहा गया ।

वस्त्राचल – भगवान नेमिनाथ ने वस्त्र त्याग कर जैनेश्वरी दीक्षा धारण की, इससे इसका नाम वस्त्राचल भी प्रसिद्ध हुआ ।

रामगिरि – ‘रमन्ते योगिनो शुद्ध स्वरुपे यस्मिन’ अर्थाति जिस गिरि पर मुनिगण अपने शुद्ध स्वरुप में समाधि लगाकर मग्न हो रमण करें, इससे उसे रामगिरि कहा गया ।

प्रभासगिरि – प्रकर्ष कर सबसे दिप्तिमान हैं, इससे प्रभास नाम पड़ा ।

गिरनार पर्वत और नेमिनाथ के वैष्णव हिन्दू विद्वान भी इस प्रकार मानते हैं । ऊपर जो श्लोक दिये हैं वे स्कन्ध पुराण प्रभास खण्ड के 16वें अध्याय के पृष्ठ 221 से अदघृत हैं ।

गिरनार महात्म्य –

 

गिरनार पर्वत सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ -क्षेत्र हैं । यह गुजरात राज्य के सौराष्ट्र संभाग में स्थित हैं । गिरनार क्षेत्र पर जैन धर्म के बाइसवें तीर्थकर अरिष्टनेमि (नेमिनाथ) के तीन कल्याणक – दीक्षा, केवल ज्ञान और निर्वाण – हुये थे । षट – खण्डागम सिद्धान्त – शास्त्र की आचार्य वीरसेन कृत धवला टीका में इसे क्षेत्र-मंगल माना हैं । जहाँ किसी तीर्थकर के तीन कल्याणक हुये हों, वह क्षेत्र वस्तुत: अत्यन्त पवित्र बन ही जाता है । अत: गिरनार क्षेत्र अत्यन्त पावन तीर्थ भूमि है । यहाँ पर भगवान की दिव्य ध्वनि खिरी थी । यहीं से उनका धर्मचक्र का प्रवर्तन हुआ । वे अनेक बार यहाँ पधारे और उनकी कल्याणमयी देशना से अनेक भव्य जीवों का कल्याण हुआ और उनका निर्वाण भी इसी क्षेत्र से हुआ । इनके अतिरिक्त यहाँ से प्रद्युम्न कुमार, शम्बु कुमार, अनिरुद्ध कुमार, वरदत्तादि बहतर करोड़ सात सौ मुनियो ने मुक्ति प्राप्त की । अत: यह क्षेत्र वस्तुत: अत्यधिक पवित्र बन गया है । इसलिये इसे तीर्थराज भी कहा जाता है आचार्य वीरसेन ने क्षेत्र मंगल के विषय में लिखा है –

क्षेत्र मंगल – ‘गुणपरिणत आसन क्षेत्र’ अर्थात् जहाँ पर योगसान, वीरासन इत्यादि अनेक आसनों से तदनुकूल अनेक प्रकार के योगाभ्यास, जितेन्द्रयता गुण प्राप्त किये गये हों ऐसा क्षेत्र, परिनिष्क्रमण क्षेत्र (जहाँ किसी तीर्थकर ने दीक्षा ली हो ) और निर्वाण क्षेत्र आदि को क्षेत्र मंगल कहते हैं । जैसे ऊर्ज्जयन्त (गिरनार) चम्पापुर, पावापुर आदि । आचार्य यतिवृषभ ने तिलोय पण्णति (प्रथम अधिकार गाथा 21-22) मैं ऊर्ज्जयन्त को क्षेत्र मंगल कहा है । दीक्षा कल्याणक – विषय के अन्तर्गत तिलोय पण्णति मे लिखा हैं –

चेतासु सुद्धसट्ठो अवरण्हे सावणम्मि णेमिजियो ।
तदिय खवणम्मि गिण्हदि सहकारं वणम्मि तव चरणं ।। 4 । 665
(वि.सं. की. पांचवीं सदी)

अर्थात् भगवान नेमिनाथ ने श्रावण शुक्ला षष्ठी को चित्रा नक्षत्र में सहकार वन में तृतीय भक्त के साथ तप को ग्रहण किया अर्थात् दीक्षा ली ।

यह सहकार वन गिरनार पर्वत पर है और वर्तमान में इसे सहस्त्राम्रवन (सहसावन) कहा जाता हैं । तीर्थकर नेमिनाथ ने दीक्षावन की एक उज्जवल शिला पर बैठकर ‘नम: सिद्धेभ्य:’ मंगलोच्चार पूर्वक हाथ जोड़कर सिद्ध भगवान की वन्दना की और आत्म- चिन्तन में शुद्धोपयोगी होकर साक्षात श्रमण बन गये । लौकान्तिक देवों ने उनके तप को सराहा । केवल छप्पन दिन पश्चात् ही उन्हें केवल ज्ञान (अनन्त ज्ञान) हो गया । छप्पन दिन पूर्व इस गिरिराज के ऊपर देवताओं औऱ मनुष्यों ने दीक्षा कल्याणक महोत्सव मनाया था ।

केवल ज्ञान कल्याणक – इस बारे में ‘तिलोय पण्णति’ में लिखा है –

‘उस्सउल सुबक पडिवद पुव्वणे उर्ज्जयन्त गिरिसिहरे ।
चिते रिक्ते जादं णेमिस्सय केवलं णाणं ।। 4 । 669
(वि.स.5)

अर्थात् नेमि भगवान को आसौज शुक्ला प्रतिपक्ष के पूर्वाह्न समय में चित्रा नक्षत्र के रहते ऊर्ज्जयन्त गिरि के शिखर पर केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ ।

द्वारिका पुरी में भव्य राजसभा भरी थी । महाराजा समुद्र विजय तथा बलदेव – वासुदेव (श्री कृष्ण चक्रवर्ती नारायण) आदि बैठे और नेमिनाथ का गुणगान हो रहा था । उसी समय एक दूत ने राजसभा में प्रवेश किया और अत्यन्त हर्षपूर्वक कहने लगा – भगवान नेमिनाथ की जय है । महाराज भगवान नेमिनाथ ने शुद्धोपयोग की क्षपक श्रेणी लगाकर केवल ज्ञान प्राप्त किया है । समाचार सुनते ही सभाजन आनन्द से बोल उठे – वाह वाह ! धन्य हैं नेमि प्रभु सर्वज्ञ परमात्मा हो गये, उन्हें नमस्कार हो । ऐसा कहकर महाराजा समुद्र विजय, श्री कृष्ण, बलभद्र आदि सब धूमधाम सहित श्री नेमिनाथ भगवान के दर्शन करने गिरनार पर्वत पहुँचे । इधर गिरनार पर्वत पर इन्द्र आज्ञा से कुबेर द्वारा समोशरण की रचना हो गई ।

इस भव्य समोशरण में बारह सभा है – चार सभा में चार जाति के देव, चार सभा में देवांगनायें, एक सभा में मुनिराज, एक सभा में मनुष्य (जिसमें ऐलकव्रती, अव्रती श्रावक हैं), एक सभा में स्त्रियाँ (जिसमें आर्यिकादिक, व्रती अव्रती श्राविकायें है), और एक सभा तिर्यञ्च प्राणियों की हैं । इसी प्रकार बारह सभा के जीवों ने भगवान की दिव्य ध्वनि (धर्मोपदेश ध्वनि) सुनी । उनकी उपदेश सभा में ग्यारह गणघर थे ।

भगवान नेमिनाथ केवली अवस्था में कुल 699 वर्ष 10 मास 4 दिन रहे औऱ अनेक देशों में विहार किया, जब निर्वाण काल समीप आ गया तो भगवान पुन: गिरनार पर्वत पर लौट आये । उनके आने पर पुन: समोशरण की रचना हो गयी । भगवान का अंतिम उपदेश इसी पर्वत पर हुआ । जब आयु का एक मास शेष रह गया तो भगवान योग निरोध कर आत्म- ध्यान में लीन हो गये । अन्त में चार अघातिया कर्मो को निर्मूल करके उन्होने निर्वाण प्राप्त किया ।

निर्वाण कल्याणक – ‘तिलोय पण्णत्ति’ शास्त्र में भगवान के निर्वाण के सम्बन्ध में लिखा हैं –

बहु भट्टमी पदो से आसाढ़े जम्मभम्मि उज्जंते ।
छत्तीसाघिय पणसय सहिदो णेमीसरो सिद्धो ।। 4 ।। 1206
(वि.सं.5)

अर्थात् भगवान नेमीश्वर अषाढ़ शुक्ला अष्टमी के दिन प्रदोष काल मे अपने जन्म नक्षत्र के रहते 536 मुनियों के साथ उर्ज्जयन्तगिरि (गिरनार) से सिद्ध हुए ।

महाकवि आचार्य गुणभद्र ने उत्तरपुराण में लिखा है

(हिन्दी भाषा – अनुवाद ) भट्टारक श्री नेमिनाथ स्वामी गिरनार पर्वत पर जा विराजमान हुए । उन्होंने छह सौ निन्यानवे वर्ष नौ महीना और चार दिन विहार किया । फिर विहार छोड़कर पाँच सौ तैंतीस मुनिराजों के साथ एक महीने तक योगों का निरोध कर अषाढ़ शुक्ल सप्तमी के चित्रा नक्षत्र में रात्रि के प्रारम्भ में ही चारों अघातिया कर्मो का नाश कर वे मुक्त हुए । उसी समय इन्द्रादि देवों ने आकर बड़ी भक्तिभाव से विधि पूर्वक पाँचवा निर्वाण कल्याणक उत्सव मनाया ।

ज्ञातव्य हो कि आचार्य यतिवृषभ ने तिलोय पण्णति में भगवान नेमिनाथ के साथ मुक्त होने वाले मुनियों की संख्या 536 बताई है ।

प्राकृत निर्वाण काण्ड में आचार्य कुन्दकुन्द (वि.सं. 2) ने उर्ज्जयन्त पर्वत से बहतर कोटि सात सौ मुनियों के निर्वाण गमन का उल्लेख किया है –

‘ णेमिसामी पज्जुणो संबुकुमारो तहेव अणिरुद्वो ।
बाहत्तरि कोडियो उर्ज्जयन्ते सत्तासया सिद्वा ।। 5 ।।

अर्थात् नेमिनाथ भगवावन के अतिरिक्त प्रद्युमन, अनिरुद्ध कुमार , संबु कुमार आदि बहतर करोड़ सात सौ मुनियों ने उर्ज्जयन्तागिरि (गिरनार) से सिद्ध पद प्राप्त किया ।

आचार्य जिनसेन ने ‘हरिवंश पुराण’ सर्ग 65 में बताया है कि समुद्र विजय आदि नौ भाई, देवकी के युगलिया छह पुत्र शम्बु और प्रद्युम्न कुमार आदि अन्य मुनि भी उर्ज्जयन्त से मोक्ष गये इसलिये उस समय से गिरनार आदि निर्वाण स्थान सारे संसार मे विख्यात हुये औऱ तीर्थ यात्रा के लिये भव्य लोगों के आने से सुशोभित हुये ।

आचार्य पूज्यपाद देवनन्दि ने संस्कृत निर्वाण भक्ति में लिखा है

नष्टाष्ट कर्म समये ‘तदरिष्टनेमि: संप्राप्तवान् क्षितिधरे बुहदुर्जयन्ते’ – यह मोक्ष अरिष्टनेमि ने आठों कर्मो को नाश करने के समय ही उर्ज्जयन्त पर्वत से प्राप्त किया । अर्थात् भगवान नेमिनाथ स्वामी गिरनार पर्वत से मोक्ष पधारे ।

उत्तर पुराण सर्ग 72 श्लोक 180 – 180 में बताया है कि

‘ द्वीपायन मुनि द्वारा द्वारिका- दाह का निदान करने पर जाम्बवती के पुत्र शम्बु और प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध ने संयम धारण कर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की ।

वे दोनों प्रद्युम्न मुनि के साथ उर्ज्जनायन्तगिरि के ऊंचे तीन शिखरों पर ध्यान आरुढ़ होकर प्रतिमायोग से स्थित हो गये । उन्होंने शुक्ल ध्यान को पूरा कर घातिया कर्मो का नाश किया औऱ नौ केवल लब्धियाँ पाकर मोक्ष पद प्राप्त किया ।

इसमें जिन तीन कूटों का संकेत आया है उसके अनुसार यह मान्यता आज भी प्रचलित है कि द्वितीय कूट पर अनिरुद्ध कुमार के चरण चिह्न बने हुए हैं । तीसरे कूट पर शम्बु कुमार के और चौथे पर प्रद्युम्न कुमार के चरण चिह्न उत्तीर्ण हैं ।

उदयकीर्ति कृत अपभ्रंश निर्वाण भक्ति में उर्ज्जयन्त को भगवान नेमिनाथ प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और 772 कोटि मुनियों का निर्वाण स्थल माना है । गजकुमार श्री कृष्ण का अनुज था । वह देवकी से उत्पन्न हुआ था । यह गजतकुमार भी रेवतक (गिरनार) से ही मोक्ष गये थे ।

इस प्रकार गिरनार से करोड़ो मुनियों को निर्वाण प्राप्त हुआ । अत: यह निर्वाण क्षेत्र, सिद्ध क्षेत्र परम पवित्र भूमि हैं । यहाँ एक बात का स्पष्टीकरण आवश्यक है कि प्राकृत निर्वाण काण्ड में उर्ज्जयन्तगिरि से मुक्ति प्राप्त करने वाले मुनियों की संख्या दी है जो इस भाँति है – ‘बाहत्तरि कोडियो उर्ज्जयन्ते सतसया बन्दे – कुछ विद्वान इसका अर्थ 72 करोड़ सात सौ मुनि करते हैं । अन्य विद्वान 772 करोड़ मुनि करते हैं । किन्तु समाज में प्रचलित मान्यता 72 करोड़ सात सौ की है । निर्वाण काण्ड की भाषा के दोनों अर्थ निकलते हैं । इतने मुनियों का निर्वाण – धाम होने से गिरनार की ख्याति है और मान्यता सम्मेद शिखर के समान है ।

अपभ्रंश के ‘ णायकुमार चरिउ’ में नागकुमार की उर्ज्जयन्त- यात्रा का वर्णन है । उसमें बताया गया है कि पहले नागकुमार ने उस स्थान की वन्दना की जहाँ नेमिनाथ ने दीक्षा धारण की थी । यह सहस्त्राम्रवन (सेसावन) है । उपरान्त उन्होंने ज्ञातिशाल की वन्दना की । यह भगवान के केवल ज्ञान प्राप्त होने का स्थान था । इसके बाद अनिरुद्ध कुमार, शम्बु कुमार, प्रद्युमन कुमार आदि मुनियों और नेमिनाथ के निर्वाण स्थानों की पूजा की । अन्त में उन्होंने अम्बिका देवी के मंदिर को देखा जहाँ उन्होंने दीन- अनार्थों को दान दिया फिर वापिस गिरनार (जूनागढ़) आये ।

इससे ज्ञात होता है कि नेमिनाथ भगवान के दीक्षा, केवल ज्ञान और निर्वाण स्थान अलग-अलग थे जैसा कि वर्तमान में भी है । राजमती ने भी विरक्त होकर गिरनार पर दीक्षा ली और गिरनार पर ही तप किया था ।

इन्द्र द्वारा चिह्नित सिद्ध शिला

जिस स्थान पर भगवान नेंमिनाथ को निर्वाण प्राप्त हुआ था, वहाँ इन्द्र ने वज्र से सिद्धिशिला का निर्माण करके उसमें भगवान के चरण – चिह्न उत्कीर्ण किये ।

इस आशय की सूचना ‘हरिवंश पुराण (सर्ग 65 श्लोक 14) में दी है । आचार्य दामनन्दी ने भी ‘ पुराणसार संग्रह’ में इसका समर्थन किया है । आचार्य समन्तभद्व इसका उदधाटन कई शताब्दी पूर्व कर चुके थे । उन्होंने ‘स्वयंभू स्तोत्र’ में बताया है कि – ‘हे उर्जयन्त ! तू इसी पृथ्वी तल के मध्य में कुंकद के समान ऊँचा है विधाधर दम्पत्ति तेरे ऊपर रहते हैं, तू शिखरों से सुशोभित है, मेघ पटल तेरे तट भाग को ही छू पाते है तथा इन्द्र ने तेरे पवित्र अंग पर वज्र से नेमिनाम के चरण चिह्न अंकित किये थे । भगवान नेमिनाम जिस स्थान से मुक्त हुए थे , वह स्थान अत्यन्त पवित्र और लोक पूज्य हो गया था । उस स्थान के गौरव को सदा काल के लिये अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये इन्द्र ने वज्र से चरण- चिह्न अंकित किये ।

गिरनार पर इन्द्र द्वारा स्थापित मूर्ति

इन्द्र ने गिरनार पर्वत पर चरण चिन्ह उत्कीर्ण करने के साथ ही वहाँ वज्र से अत्यन्त शान्त औऱ आयुध और वस्त्राभरणों से रहित दिगम्बर जिनेन्द्र नेमिनाम की मूर्ति की भी स्थापना की । तत्संबंधी जानकारी यतिपति मदनकीर्ति ने भी ‘शासन चतुस्त्रिशिका’ में दी है –

सौराष्ट्रे यदुवंश भूषणमणे: श्रीनेमिनाथस्य या,
मूर्तिर्मुक्तपथोपदेशनपरा शान्तासुधा पोहनात् ।

गिरनार पर्वत की तलहटी में दिगम्बर जैन धर्मशाला है । जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि इस धर्मशाला में जिनालय है । अब पर्वतराज की वन्दना के पश्चात् यहाँ जिनालय के दर्शन करें –

निर्मल ज्ञान केन्द्र

तलहटी में पूज्य आचार्य श्री निर्मल सागर जी के संप्रेणामय शुभाषीश से नवनिर्मित समवशरण मंदिर भी दर्शनीय है इसमें महामनोहर समावेशरण की रचना है एवं प्राचीन मूर्तियाँ स्थापित हैं । इसके अतिरिक्त यहाँ आधुनिकतम् धर्मशाला भी निर्मित है । पूज्य आचार्य श्री की प्रेरणा और आशीर्वाद से निर्मित गुरुकुल, ध्यान केन्द्र आदि ने गिरनार की शोभा में चार चाँद लगा दिये हैं ।

जूनागढ़ शहर में भी एक दिगम्बर जैन मन्दिर हैं ।